गुरु पूर्णिमा

1322

गुरु पूर्णिमा

गुरु ब्रह्मागुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरगुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं.

उक्त वाक्य उस गुरु की महिमा का बखान करते हैं जो हमारे जीवन को सही राह पर ले जाते हैं. गुरु के बिना यह जीवन बहुत अधूरा है. यूं तो हम इस समाज का हिस्सा हैं ही लेकिन हमें इस समाज के लायक बनाता है गुरु. शिक्षक दिवस के रूप में हम अपने शिक्षक को तो एक दिन देते हैं लेकिन गुरु जो ना सिर्फ शिक्षक होता है बल्कि हमें जीवन के हर मोड़ पर राह दिखाने वाला शख्स होता है उसको समर्पित है आज का दिन गुरु पूर्णिमा.

कब मानाया जाता है ?
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है.

  • इस वर्ष: शुक्रवार २७ जुलाई, २०१८(आषाढ़ मास की पूर्णिमा) को गुरु पूर्णिमा है.

गुरु पूर्णिमा : भारतीय त्योहार

वेद व्यास की जयंती : गुरु पूर्णिमा जगत गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है. माना जाता है कि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था. वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने आज ही के दिन की थी. वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था. उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है. ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है.

बुद्ध ने दिया था प्रथम उपदेश : बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के पांच सप्ताह बाद भगवान बुद्ध ने सारनाथ पहुंच आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने प्रथम पांच शिष्यों को उपदेश दिया था. इसे बौद्ध ग्रंथों में ‘धर्मचक्र प्रवर्तन‘ कहा जाता है. बौद्ध धर्मावलंबी इसी गुरु-शिष्य परंपरा के तहत गुरु पूर्णिमा मनाते हैं.

गुरु पूर्णिमा: गुरुपूर्णिमा का महत्व

गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा. गुरु के लिए पूर्णिमा से बढ़कर और कोई तिथि नहीं हो सकती. जो स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है. पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत:करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है. इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए. यह पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा भी कहलाती है. गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है. गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है.

गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला.

आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है.

गुरु-शिष्य परम्परा से जुडी कुछ कहानी:

गुरु-शिष्य-1: श्रीगुरु की आज्ञा पालन हेतु स्वयं को झोंक देने वाला शिष्य आरुणी !

प्राचीन समय में धौम्य नामक मुनि का एक आश्रम था । उस आश्रम में उनके अनेक शिष्य विद्याभ्यास के लिए रहते थे। उनमें आरुणी नामक एक शिष्य था । एक समय धुंआधार वर्षा होने लगी । समीप के नाले का पानी खेत में न जाए, इसहेतु प्रतिबंध लगानेके लिए वहां एक बांध बनाया गया । उस बांध में दरारें पडने लगी तब गुरुदेव ने कुछ शिष्यों से कहा, ‘पानी को खेत में आने से रोको !’

आरुणी एवं कुछ शिष्य बांध के समीप आए । बांध में आई दरारों को भरने के लिए सबने प्रयास किए ; परंतु पानी का वेग अत्यधिक होने के कारण संपूर्ण प्रयास निष्फल हो गए । बांध के बीच का भाग टूटने लगा एवं पानी धीरे-धीरे खेत में आने लगा । अब कोई लाभ नहीं, ऐसा सोचकर सभी शिष्य लौट आए । दिनभर परिश्रम करने से थके सभी शिष्य गाढी नींद से सो गए । सवेरे तक वर्षा थम गई । तब सबके ध्यान में आया कि आरुणी का कोई पता नहीं है ।

संपूर्ण आश्रम में ढूंढने पर भी जब वह नहीं मिला, तब वे सभी गुरुदेव जी के समीप जाकर बोले, ‘‘ हे गुरुदेव, आरुणी खो गया है ।” श्रीगुरु बोले, ‘हम खेत में जाकर देखेंगे’ सब शिष्य एवं ऋषि धौम्य खेत में गए और उन्होंने देखा कि, टूटे हुए बांध के बीच में पानी को रोकने हेतु स्वयं आरुणी ही वहां आडा होकर सोया हुआ है । यह देखकर सबको आश्चर्य हुआ । रातभर पानी में भोजन-नींद के बिना ऐसा करते देख आरुणी के प्रति सभी के मन में प्रेमभाव निर्माण हुआ ।

वर्षा रूक जाने के कारण पानी का बहाव तो पूर्व की अपेक्षा घट गया था परंतु आरुणी को वहां नींद लग गई थी । सभी वहां गए और उसे जगाया । श्रीगुरु ने उसे समीप लेकर प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरा । यह देखकर सब शिष्यों के आंखों में पानी आया । आरुणी से हमें क्या सिखना है ? तो श्रीगुरु की आज्ञापालन करने की तीव्र उत्कंठा । आज्ञापालन करने के लिए आरुणी ने स्वयं का विचार नहीं किया; इसलिए वह गुरु का एक सच्चा शिष्य बना ।

अतः हम भी हमारे गुरु के चरणों में प्रार्थना करेंगे कि, ‘हे गुरुदेव, हममें भी ‘आज्ञापालन’ गुण निर्माण हो !’

गुरु-शिष्य-2: रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने विचारो को वाणी देने वाले शिष्य की स्वयम खोज की थी .उन्होंने एक मंदिर में बालक नरेंद्र को देखा. वह उस पर मुग्ध हो गए. अपनी निराकार कल्पना की सकर्ता उन्होंने इस बालक में देखी.उन्होंने इस बालक का परिचय पूछा और प्रतिदिन आने को कहा. बालक नरेंद्र निर्भीक थे उन्होंने कहा “ मैं नहीं आऊंगा “ और आऊं भी क्यों . पर बालक नरेंद्र ने एक बात पूछी क्या आप माँ काली के मुझे दर्शन करा सकते हैं जैसे मैं आपको देख रहा हु ऐसे माँ काली को भी देख सकता हु ? रामकृष्ण परमहंस ने कहा – हाँ ज़रूर करा सकता हु तुम कल मेरे पास आ जाना .
इसके बाद नरेंद्र चला गया . रामकृष्ण परमहंसने माँ काली से प्रार्थना की, की आप उस बालक को दर्शन दे ताकि वह उनकी वाणी बनकर वैदिक धर्म का प्रचार कर सके .दूसरे दिन जब नरेंद्र आया तो रामकृष्ण परमहंस ने उसे स्नान करने को कहा , जब विवेकानंद नहा रहे थे तो गुरु जी ने उन्हें डुबाना प्रारम्भ कर दिया . नरेंद्र में बाहर निकलने का प्रयास किया और बाहर निकल भी आये. फिर गुरु जी ने उनसे पूछा जब तुम डुब रहे थे तब तुम्हारे मन में क्या इच्छा थी.

नरेंद्र ने बताया की मेरे मन में बाहर आने की इच्छा थी गुरु जी ने फिर पूछा और कोई इच्छा भी थी तुम्हारे मन में, नरेंद्र ने कहा नहीं और कोई भी इच्छा नहीं थी उस समय मेरे मन में. फिर गुरु जी कहा बस माँ काली के दर्शन के लिए भी यही चाहिए की सिर्फ माँ काली के दर्शन की इच्छा हो और कोई भी इच्छा न रहे . इसके बाद उन्होंने नरेंद्र को माँ काली के दर्शन भी कराये . बालक नरेंद्र पर इस बात का इतना प्रभाव पड़ा की वह उनका शिष्य बन गया और रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र का नाम बदल कर विवेकानंद रखा. विवेकानंद ने उनके पास रहकर सभी धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन किया . और बाद में विदेश भी गए . परतंत्र भारत को उन्होंने एक बार फिर से जगत गुरु कहे जाने का अवसर दिया . अपनी साधना को भी उन्होंने कोई महत्त्व नहीं दिया और कहा में जो कुछ बोलता हु, करता हु वह मेरे गुरु का दिया हुआ है

     || गुरुकृपा हि  केवलं शिष्यस्य परम मंगलम ||


गुरुपौर्णिमा मराठी आवृत्ती

गुरुपौर्णिमा- गुरुर्ब्रह्माग्रुरुर्विष्णुःगुरुर्देवोमहेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवेनमः ॥

 

Leave a Reply