पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के प्रेरक प्रसंग: #2 दया

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दीनदयाल उपाध्याय जी मुजफ्फरपुर से मोतिहारी जा रहे थे. उसी डिब्बे में जिले के कोई उच्च पदाधिकारी भी सफर कर रहे थे. दीनदयाल जी के जूते गंदे थे, डिब्बे में एक लड़का आया और उपाध्याय जी के जूते उठा कर पॉलिश करने लगा. उपाध्याय जी अखबार पढ़ रहे थे पढ़ते रहे, जब पॉलिश कर चुका तो वह लड़का उक्त अफसर से भी पूछने लगा, “साहब पॉलिश!”

साहब ने पूछा, “कपड़ा है साफ करने का?”

“नहीं”, लड़के ने कहा.

साहब ने लड़के को जाने का इशारा कर दिया. तब लड़का उपाध्याय जी से पैसे लेकर वापस जाने लगा, उसके चेहरे पर बेबसी की छाया थी. तभी उपाध्याय जी उठे और उसे रोककर कहा, “बच्चे साहब के जूतों पर भी पॉलिश करो और फिर अपने झोली से पुराने और  तौलिये का एक टुकड़ा फाड़ा और लड़के को देते हुए कहा लो बच्चे यह कपड़ा लो ठीक से रखना फेंकना नहीं. देखा बिना इसके तुम्हारा अभी नुकसान हो गया था.

लड़का खुश होकर अफसर के जूतों पर पॉलिश करने लगा. अब उपाध्याय जी का वास्तविक परिचय पाकर वह महाशय चकित हो रहे थे.

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