पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के प्रेरक प्रसंग: #1 अबला की रक्षा

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मध्य प्रदेश जाने के लिए मैं और पण्डित दीनदयाल जी दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर खड़ी गाड़ी के थर्ड क्लास के डिब्बे में बैठ चुके थे. गाड़ी जाने में अभी आधा घंटा शेष था जिसके कारण डिब्बे में बहुत कम यात्री बैठे थे.

इसी समय दो औरतें डिब्बे में आयीं और भीख मांगने लगी. पुलिस के एक सिपाही ने उन्हें देखा और उन्हें गाली देते हुए मारने लगा. पंडित जी कुछ समय तक इस दृश्य को देखते रहे लेकिन अचानक उठ कर उन्होंने पुलिस के सिपाही को पीटने से रोकने का प्रयत्न किया. पुलिस के सिपाही ने अभद्रता से कहा- “यह औरतें चोर हैं और यह तुम्हें तुम्हें परेशानी में डाल सकती हैं. जाओ और अपनी सीट पर बैठो यह मेरा काम है और उसे करने में दखल मत दो.”

पंडित जी यह वाक्य सुनते ही क्रोधित हो उठे. मैंने जीवन में पहली और अंतिम बार उन्हें इस क्रोधावेश में देखा था. उन्होंने पुलिस के सिपाही का हाथ पकड़ते हुए कहा-

मैं देखता हूं कि तुम उन्हें कैसे मारते हो. अदालत उन्हें उनके और सामाजिक कार्यों के लिए दंड दे सकती है लेकिन एक स्त्री के साथ अभद्र व्यवहार को देखना मेरे लिए असहनीय है.

पुलिस के सिपाही ने अपनी ड्यूटी को माना और क्षमा की प्रार्थना की

स्वर्गीय यज्ञदत्त शर्मा – पंजाब

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