जिउतिया व्रत एवं इससे जुडी कथाएं

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जितिया पर्व 2018 कब है: सोमवार 1 अक्टूबर 2018 से बुद्धवार 3 अक्टूबर 2018

हर माता-पिता की इच्‍छा होती है‍ कि उनके बच्‍चे खूब तरक्‍की करें. उनकी आय में बढ़ोतरी हो और उनकी उम्र लम्‍बी है. इसकी कामना के साथ दो दिवसीय जीवित पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत शुरू होगा. इस व्रत में सोमवार १ अक्टूबर के दिन नहाय-खाय की परम्‍परा होगी. जिसके बाद सोमवार से बुधवार तक संतान की लम्‍बी आयु के लिए उपवास रखा जयेगा और पूजा-अर्चना की जाएगी. निर्जला उपवास किया जायेगा. इस व्रत में पानी तक नहीं पीना होता है. इस व्रत को आश्विन कृष्ण पक्ष के प्रदोष काल में किया जाता हैं.

कहा जाता है कि यह व्रत माताओं द्वारा अपने बच्‍चों की आयु, निरोगी काया तथा उनके कल्याण के लिए किया जाता है. इस व्रत को कई जगहों पर ‘जीतिया’ या ‘जीउतिया’, ‘जिमूतवाहन व्रत’ भी कहा जाता है.

जीउतिया

इस व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी हैं, जो माताएं यह व्रत रखती हैं उन्‍हें जीमूतवाहन की कथा जरूर सुननी चाहिए. आइए आपको संक्षेप में यह कथा बताते हैं- जीमूतवाहन गंधर्वों के राजकुमार थे, वह बड़े ही उदार व्‍यक्ति थे. इनके पिता ने वृद्धाआश्रम जाने की सोची. जाने से पहले इन्‍होंने जीमूतवाहन को राजा के सिहांसन पर बैठा दिया, लेकिन जीमूतवाहन का मन राजकाज में नहीं लगता था. जिससे विमुख होकर जीमूतवाहन ने अपने छोटे भाइयों को राजकाज सौंप दिया और खुद जंगल में अपने पिता के पास चले आए. यहां आकर उन्‍होंने मलयवती नाम की एक राजकुमारी से विवाह भी कर लिया.

एक दिन जंगल में भ्रमण के दौरान जीमूतवाहन को विलाप करती हुई एक वृद्ध स्त्री मिली. महिला से उन्‍होंने विलाप करने का कारण पूछा तो महिला ने बताया कि वह शंखचूड़ नाग की माता है जिसे विष्णु के वाहन गरूड़ आज उठाकर ले जाएंगे. यह सून जीमूतवाहन ने खुद गरूड़ के साथ जाने का फैसला किया. अब गरूड़ आया और शंखचूड़ को उठाकर ले जाने लगा, तभी उसे आभास हुआ कि वह शंखचूड़ की जगह किसी व्‍यक्ति को ले आया है.

अब गरूड़ ने जीमूतवाहन से पूछा कि तुम कौन हो. जीमूतवाहन ने कहा कि मैं शंखचूड़ की माता को पुत्र वियोग से बचाना चाहता हूं, तुम भोजन स्‍वरूप मेरा भोग कर सकते हो. तभी से इस व्रत का प्रचलन हुआ और यह कथा प्रचलित हुई.

दूसरी कथा के अनुसार यह व्रत महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। महाभारत युद्ध के बाद प‍िता की मृत्‍यु से दुखी अश्वथामा पांडवों के शिविर गया। उसने वहां पर सो रहे पांच लोगों की हत्या कर दी। उसे लगा था कि‍ उसने पांडवों को मार द‍िया। ऐसे में जब उसके सामने पांचो पांडव आकर खड़े हुए तो अश्वथामा को पता चला कि‍ उसने तो द्रौपदी के पुत्रों की हत्‍या की है।

इसके बाद अर्जुन अश्वथामा के इस कृत्‍य पर क्रोध‍ित हुए और उन्‍होंने उसे बंदी बनाते हुए उसकी द‍िव्‍य मण‍ि छीन ली। ऐसे में अश्वथामा का क्रोध सातवें आसमान पर हो गया और बदले की भावना में सुलग रहा था। ज‍िसकी वजह से उसने अभ‍िमन्‍यु की पत्‍नी उत्‍तरा के गर्भ को नष्‍ट करने की योजना बनाई। उत्‍तरा के गर्भ में पल रही संतान को खत्‍म करने के ल‍िए अश्वथामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग क‍िया। उसे भरोसा था क‍ि ब्रह्मास्त्र उसे धोखा नहीं देगा। ऐसे में भगवान कृष्‍ण ने उत्‍तरा को अजन्‍मी संतान को गर्भ में ही दोबारा जीव‍ित कर द‍िया। ऐसे में गर्भ में मरने के बाद पुन: जीव‍ित होने वाले उत्‍तरा के पुत्र का नाम जीवितपुत्रिका पड़ गया था। ज‍िसके बाद से यह व्रत पुत्रों की लंबी आयु के ल‍िए क‍िया जाने लगा।

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