भारत की महान बेटी: भगिनी निवेदिता – Bhagini Nivedita

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स्वामी विवेकानन्द की शिष्या भगिनी निवेदिता का जन्म 28 अक्टूबर, 1867 को आयरलैंड में हुआ था। वे एक अंग्रेज-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक एवं एक महान शिक्षिका थीं। भारत के प्रति अपार श्रद्धा और प्रेम के चलते वे आज भी प्रत्येक भारतवासी के लिए देशभक्ति की महान प्रेरणा का स्रोत है।

 

भगिनी निवेदिता महत्वपूर्ण तथ्य


नाम – मार्गरेट नोबेल

जन्म – 28 अक्टूम्बर, 1867

जन्म स्थान – (डुंगानोन ) को-टाइरोन

पिता – सैमुएल रिचमंड नोबेल

माता – इसाबेल नोबेल

गुरु – स्वामी विवेकानन्द

कार्य स्थल- भारत

विवाह – अविवाहित


भारत की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े बिना भारत को समझना और उससे प्रेम करना असम्भव है। स्वामी विवेकानन्दजी के आह्वान पर भारत की सेवा करने भारत आई मार्गारेट नोबल के लिए भी यह इतना सहज नहीं था। पर अपने गुरु के अद्भुत प्रशिक्षण व स्वयं की अविचल श्रद्धा से उन्होंने इस दुष्कर कार्य को सम्पन्न किया। इस प्रशिक्षण के मध्य कई बार उन्हें स्वामीजी के क्रोध का सामना करना पड़ा। जब एक बार किसी सन्दर्भ में अनजाने में बिना किसी हेतु के उनके मुख से भारतीयों के लिए ‘ये भारतीय’ ऐसा पराया सम्बोधन निकला। किन्तु स्वामीजी ने अत्यन्त गम्भीरता से झिड़की दी, ‘‘तुम यदि भारत को अपना नहीं मानती तो अपने ब्रिटिश अभिमान के साथ वापिस जा सकती हो। यदि यहां रहना है तो अपने अन्दर से सारा ब्रिटिशपन, सारी अंग्रेजियत निकाल दों’’ अपना सबकुछ छोड़कर भारत की सेवा के लिए भारत आई मार्गारेट के अहंकार पर यह भयंकर चोट थी। उन्होंने अपनी मन की पीड़ा को अपने पत्रों में व्यक्त किया है। पर इसके बाद भारत, भारतीय और हर हिन्दू चीज के लिए उनके मुख से अपनेपन के अलावा कुछ नहीं निकला।

Bhagini-nivedita orignal photo

भारत को अंग्रेजी में भी वे कभी ‘इट’ सर्वनाम नहीं लगाती, अत्यन्त व्यक्तिगतता से ‘हर’ ही कहती। उनके हिन्दुत्व को अपनाने के सन्दर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकूर ने कहा था, ‘‘आजतक इस भूमि पर जन्म लिए किसी भी अन्य हिन्दू से भगिनी निवेदिता अधिक हिन्दू थी।’’ उनके इस समर्पण को ही स्वामीजी ने उनके दीक्षित नाम में अभिव्यक्त किया था – ‘निवेदिता’। नवधा भक्ति के अंतिम सोपान आत्मनिवेदन को दर्शाता पूर्ण समर्पण।

 

वास्तव में लोकमाता हो गई थी। जो भी उनके सम्पर्क में आता उसका जीवन वे आलोकित कर देती। अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों को उन्होंने केवल प्रेरणा व सम्बल ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर सब प्रकार की सहायता की। उनके स्वयं के विचार गरम दल के निकट होने बाद भी नरम दल के सभी कांग्रेसियों से उनके आत्मीय सम्बन्ध थे। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते समय गोपाल कृष्ण गोखले अत्यन्त भावविभोर हो गए थे। डॉ. जगदीश चन्द्र बसु के साथ लण्डन में हो रहे अन्याय का उन्होंने घोर विरोध किया था। हताश बसु के साथ बैठकर उनके प्रबन्धों का लेखन करवाया। भारतीय कलाकारों को स्वदेशी कलाओं के विकास के लिए प्रेरित किया। नन्दलाल बोस, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे अनेक कलाकारों को पुरातन भारतीय कला के पुनरुज्जीवन के कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सुब्रह्मण्यम् भारती के विख्यात भारतभक्ति स्तोत्र की प्रेरणा निवेदिता ही थी। श्री अरविन्द के क्रांतिकारियों को संगठित करने के कार्य में भी भगीनी निवेदिता का सम्बल व मार्गदर्शन था। उनकी अनुपस्थिति में ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादन का कार्य भी निवेदिता ने ही सम्भाला।

 

जब कोई विदेशी विद्वान भारत और हिन्दुत्व के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते वे उसका पूरजार खण्डन करती। उनके द्वारा लिखित पुस्तकें हिन्दू जीवन पद्धति का अध्ययन वर्तमान सन्दर्भ में बेहद प्रासंगिक हैं। ‘हिन्दुत्व की पालना कथाएं’ (Cradle tales of Hinduism) ‘भारतीय जीवन जाल’ (Web of Indian Life), ‘काली हमारी माता’ (Kali The Mother) और ‘आक्रामक हिन्दूत्व’ (Aggressive Hinduism) ये कुछ ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें प्रत्येक भारतीय युवा को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए। दुर्भाग्य है कि अभी तक भगिनी निवेदिता के अधिकतर साहित्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो पाया है। Religion & Dharma का अनुवाद पथ ओर पाथेय के नाम से हुआ है। श्री शंकरी प्रसाद बसु जैसे अभ्यासु अन्वेषक के प्रयासों से उनका समग्र साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है। किन्तु उन्हीं के द्वारा दो खण्डों में रचित जीवनी ‘लोकमाता निवेदिता’ अभी बांग्ला में ही उपलब्ध है।

वर्तमान में जब भारत की युवा पीढ़ी भारत की जड़ों से कटने की कगार पर है और धर्म की सही व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इस समर्पित महीयसी के जीवन के माध्यम से भारत का भारत से परिचय भगिनी निवेदिता के जीवन कार्यों व साहित्य को घर-घर तक पहुंचाने से हो सकता है। 13 अक्टूबर, 1911 को वे दार्जिलिंग में अपने गुरुतत्व में सदा के लिए लीन हो गईं। स्वामीजी के स्वप्न को साकार कर माँ भारती को विश्वगुरु के पद पर पुनः आसीन करने के लिए हर घर में निवेदिता अवतरित हो यही प्रार्थना।

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