Home अध्यात्म अद्भुत है जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा

अद्भुत है जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा

हर तरफ चहल-पहल है दूर-दूर से लोग आ रहे है तैयारी हो रही है ऐतिहासिक ‘जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा’ की. गलियां साफ हो रही हैं और फूलों झलरों से रास्ते महकाएं जा रहे हैं.
रथयात्रा के बारे में ऐसा माना जाता है कि इस रथयात्रा के दौरान जो बारिश होती है, वह बर्षा भी पुण्य की वर्षा कहलाती है. और जिसने भगवान के रथ को थोड़ा सा भी धक्का दे दिया समझिए उसे मोक्ष मिल गया.
जग्गनाथपूरी भारत के चार पवित्र धामों में से एक है और पुरी में निकलने वाली इस विशाल रथ यात्रा का अपना पौराणिक महत्व है.
इस यात्रा में विशेष रथों पर बैठकर भगवान श्री कृष्ण अपने भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर जाते हैं. फिर श्री कृष्ण अपनी रूठी हुई पत्नी को मनाते हैं और वापस आते हैं. 10 दिन तक चलने वाला यह महोत्सव हिंदू परिवारों के लिए बहुत मह्ह्त्व का है.
इस रथ यात्रा की इतिहास भी काफी रोमांचक है

देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने बनाई थी अधूरी मूर्तियां:

जगन्नाथपुरी मंदिर की मूर्तियों को ध्यान से देखा जाए तो ये तीनों अधूरी दिखाई देती हैं. इन अधूरी मूर्तियों के पीछे एक पौराणिक कथा है. श्री कृष्ण पूरी के राजा इन्द्रद्युम्न के सपने में आए और उनसे कहा कि वह पुरी के दरिया किनारे एक पेड़ के तने में उनका विग्रह बनवाएं और बाद में उसे मंदिर में स्थापित करा दें. श्रीकृष्ण के आदेशानुसार राजा ने इस काम के लिए काबिल बढ़ई की तलाश शुरू की. कुछ दिनों में एक बूढ़ा ब्राह्मण उन्हें मिला और इस विग्रह को बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन इस ब्राह्मण ने राजा के सामने एक शर्त रखी कि वह इस विग्रह को बन्द कमरे में ही बनाएगा और उसके काम करते समय कोई भी कमरे का दरवाज़ा नहीं खोलेगा नहीं तो वह काम अधूरा छोड़ कर चला जाएगा.
शुरुआत में काम की आवाज़ आई लेकिन कुछ दिनों बाद उस कमरे से आवाज़ आना बंद हो गई. राजा सोच में पड़ गया कि वह दरवाजा खोलकर एक बार देखे या नहीं. कहीं उस बूढ़े ब्राह्मण को कुछ हो ना गया हो. इस चिंता में राजा ने एक दिन उस कमरे का दरवाज़ा खोल दिया. दरवाज़ा खुलते ही उसे सामने अधूरा विग्रह मिला. तब उसे अहसास हुआ कि ब्राह्मण और कोई नहीं बल्कि खुद विश्वकर्मा थे. शर्त के खिलाफ जाकर दरवाज़ा खोलने से वह अर्तंध्यान हो गए. हालांकि, राजा उन अधूरी मूर्तियों को ही मंदिर में स्थापित करवा देता है.

इस प्रकार से जगन्नाथ मंदिर में तीनों भाई-बहनों की अधूरी मूर्तियों की पूजा शुरू हो जाती है.

आश्चर्य से कम नहीं है जगन्नाथ का मंदिर:

  1. मंदिर की सबसे खास बात यह है कि दिन के किसी भी पहर में इस मंदिर की के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती.

  2. मंदिर के ऊपर से कभी किसी प​क्षी को न तो गुजरते देखा गया है, न ही कभी कोई पक्षी मंदिर के शिखर पर बैठा पाया गया है.

  3. 800 साल पुराना यह मंदिर समुद्र तट के नजदीक स्थित है. बावजूद इसके जैसे ही आप मुख्य द्वार से प्रवेश करके मंदिर में दाखिल होंगे वैसे ही समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देना बंद हो जाती है. ठीक वैसे ही जब एक कदम बाहर निकालेंगे तो लहरों की आवाज फिर से कानों में आने लगेगी.

  4. मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र बनाया गया है. इस चक्र को किसी भी दिशा से खड़े होकर देखने पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी तरफ है.

  5. इसके साथ ही यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां शिखर पर लगा झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है. यह झंडा हर रोज बदला जाता है. मंदिर का एक पुजारी हर रोज 45 मंजिला मंदिर के शिखर पर जाता है और झंडा बदलता है.

  6. मंदिर की तरह ही यहां का भोग भी बेहद खास है. मंदिर की रसोई में भोग बनाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन उपयोग किए जाते हैं. इन बर्तनों को एक के ऊपर एक रखा जाता है. भोग बनाने के लिए आज भी चूल्हे का इस्तेमाल होता है.

  7. कहा जाता है कि हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता. जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है. मंदिर के महाप्रसाद में मालपुआ बनाएं जाते हैं और साथ में मिश्रित खिचड़ी का भोग लगाया जाता है. जो बाद में सभी भक्तों को बांटा जाता है.

माना जाता है कि जो भी इन रथों को हाथ से खींचता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. तिथी के दिन रथों पर तीनों भाई—बहनों की मूर्तियां स्थापित होती हैं और उन्हें गर्भ गृह से निकालकर श्री कृष्ण की मौसी के घर यानी गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता है.
गुंडीचा मंदिर में श्री कृष्ण दस दिनों तक वास करते हैं. इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है. जिसके अनुसार जब श्री कृष्ण अपनी मौसी के यहां वास करते हैं तो उन्हें तलाश करते हुए माता लक्ष्मी अपने मंदिर से निकलकर गुंडीचा मंदिर पहुंचती है पर उनके आने के पहले ही द्वारपाल मुख्य द्वार बंद कर देते हैं. जिससे लक्ष्मी जी रूठ कर वापस अपने मंदिर चली जाती हैं.
10 दिन बाद जब भगवान श्री कृष्ण अपने धाम जाने के लिए निकलते हैं तो पहले उनका रथ लक्ष्मी मंदिर पहुंचता है, जहां वे अपनी रूठी हुई पत्नी को मानते हैं. इसके बाद वे भाई-बहनों के साथ वापस गर्भ गृह पहुंचते हैं.
इस तरह से यह उत्सव पूरा होता है और पुरी की प्रजा अपने ईष्ट के दर्शनों के लिए फिर से एक साल का इंतजार करती है. इस त्यौहार को देखने के लिए देश-दुनिया से लोग पुरी में जमा होतें हैं. जिनके मन में मोक्ष की कामना नहीं भी है वे भी इन दिनों पुरी में रहते हुए इस दिलचस्प यात्रा का हिस्सा बनकर अपनी यादें तैयार करते हैं!

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