संस्कृत सुभाषित हिन्दी मे अर्थ सहित

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संस्कृत सुभाषित हिन्दी मे अर्थ सहित

संस्कृत सुभाषित हिन्दी मे अर्थ सहित

सुभाषित इस शब्द से ही स्पष्ट होता है कि जो सुन्दर भाषा में कहा गया है सु अर्थात् सुंदर भाषित अर्थात् भाषा में रचित। संस्कृत के सुभाषितों में सुखी और आदर्श जीवन की अनमोल सीख छुपी होती है। प्रस्तुत है जीवन मे एक सकारत्मक बदवालव लाने वाले प्रमुख सुभाषित


सुभाषित: गुणवान् वा परजन: स्वजनो निर्गुणोपि वा निर्गुण:
स्वजन: श्रेयान् य: पर: पर एव च

अर्थ: गुणवान शत्रु से भी गुणहीन मित्र अच्छा। शत्रु तो आखिर शत्रु है।


सुभाषित: पदाहतं सदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति ।
स्वस्थादेवाबमानेपि देहिनस्वद्वरं रज: ॥

अर्थ: जो पैरोंसे कुचलने पर भी उपर उठता है ऐसा मिट्टी का कण अपमान किए जाने पर भी चुप बैठनेवाले व्यक्ति से श्रेष्ठ है ।


सुभाषित: सा भार्या या प्रियं बू्रते स पुत्रो यत्र निवॄति:।
तन्मित्रं यत्र विश्वास: स देशो यत्र जीव्यते ॥

अर्थ: जो मिठी वाणी में बोले वही अच्छी पत्नी है, जिससे सुख तथा समाधान प्रााप्त होता है वही वास्तवीक में पुत्र है, जिस पर हम बीना झीझके संपूर्ण विश्वास कर सकते है वही अपना सच्चा मित्र है तथा जहा पर हम काम करके अपना पेट भर सकते है वही अपना देश है।


सुभाषित: शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे ।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ।।

अर्थ: हर एक पर्वत पर माणिक नहीं होते, हर एक हाथी में गंडस्थल में मोती नहीं होते साधु सर्वत्र नहीं होते , हर एक वनमें चंदन नहीं होता । उसी प्रकार दुनिया में भली चीजें प्रचुर मात्रा में सभी जगह नहीं मिलती ।


सुभाषित: एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु ।
तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मृतम् ॥

अर्थ: जिस प्रकार विविध रंग रूप की गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है, उसी प्रकार विविध पंथ एक ही तत्त्व की सीख देते है


सुभाषित: सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम् ।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुख दु:खयो: ॥

अर्थ: जो चीजें अपने अधिकार में नही है वह सब दु:ख है तथा जो चीज अपने अधिकार में है वह सब सुख है ।
संक्षेप में सुख और दु:ख के यह लक्षण है ।


सुभाषित: अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम् ॥

अर्थ: आलसी मनुष्य को ज्ञान कैसे प्राप्त होगा ? यदि ज्ञान नहीं तो धन नही मिलेगा ।
यदि धन नही है तो अपना मित्र कौन बनेगा ? और मित्र नही तो सुख का अनुभव कैसे मिलेगा


सुभाषित: सुलभा: पुरुषा: राजन्‌ सततं प्रियवादिन: ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।

अर्थ: मीठा-मीठा और अच्छा लगने वाला बोलने वाले बहुतायत में मिलते हैं. लेकिन अच्छा न लगने वाला और हित में बोलने वाले और सुनने वाले लोग बड़ी मुश्किल से मिलते हैं.


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सुभाषित: विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन ।
वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः ॥

अर्थ: सलाह भी समझदार को देनी चाहिए न कि किसी मूर्ख को, ध्यान रहे कि बंदरों को सलाह देने के कारण पंक्षियों ने भी अपना घोसला गंवा दिया था.


सुभाषित: यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥

अर्थ: जिसके पास खुद की बुद्धि नहीं किताबें भी उसके किस काम की? जिसकी आंखें ही नहीं हैं वो आईने का क्या करेगा?


सुभाषित: आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्शो महारिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥

अर्थ: आलस ही आदमी की देह का सबसे बड़ा दुश्मन होता है और परिश्रम सबसे बड़ा दोस्त. परिश्रम करने वाले का कभी नाश या नुकसान नहीं होता.


सुभाषित: उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥

अर्थ: कार्य करने से ही सफलता मिलती है, न कि सपने देखने से. वैसे सोते हुए शेर के मुंह में भी हिरन अपने से नहीं आता


सुभाषित: श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

अर्थ: सभी ग्रंथों में जो बात कही गई है वो है दूसरे का भला करना ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरे को दुःख देना सबसे बड़ा पाप.


सुभाषित: विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

अर्थ: पढ़ने-लिखने से नम्रता आती है. नम्रता से ज्ञान आता है. ज्ञान से पैसे आने शुरू होते हैं. पैसों से धर्म और फिर सुख मिलता है.


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सुभाषित: मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे ।
हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते ॥

अर्थ: मूर्खों की पांच निशानियां होती हैं, अहंकारी होते हैं, उनके मुंह में हमेशा बुरे शब्द होते हैं,जिद्दी होते हैं, हमेशा बुरी सी शक्ल बनाए रहते हैं और दूसरे की बात कभी नहीं मानते.


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सुभाषित: आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्व देव नमस्कार: केशवं प्रति गच्छति ॥

अर्थ: जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदीयों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुवा नमन एक ही परमेश्वर को प्राप्त होता है ।


सुभाषित: नीर क्षीर विवेके हंस आलस्यम् त्वम् एव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन् अधुना अन्य: कुलव्रतं पालयिष्यति क: ॥

अर्थ: अरे हंस यदि तुम ही पानी तथा दूध भिन्न करना छोड दोगे तो दूसरा कौन तुम्हारा यह कुलव्रत का पालन कर सकता है ? यदि बुद्धि वान् तथा कुशल मनुष्य ही अपना कर्तव्य करना छोड दे तो दूसरा कौन वह काम कर सकता है ?


सुभाषित: सर्वं परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम्
एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:

अर्थ: दुसरोंपे निर्भर रहना सर्वथा दुखका कारण होता है। आत्मनिर्भर होना सर्वथा सुखका कारण होता है। सारांश, सुख–दु:ख के ये कारण ध्यान मे रखें।


सुभाषित: यस्य भार्या गॄहे नास्ति साध्वी च प्रिायवादिनी।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथाऽरण्यं तथा गॄहम् ॥

अर्थ: जिस घर में गॄहिणी साध्वी प्रावॄत्ती की न हो तथा मॄदु भाषी न हो ऐसे घर के गॄहस्त ने घर छोड कर वन में जाना चाहिए क्यों की उसके घर में तथा वन में कोइ अंतर नही है !


सुभाषित: अकॄत्यं नैव कर्तव्य प्रााणत्यागेऽपि संस्थिते ।
न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन: ॥

अर्थ: जो कार्य करने योग्य नही है इअच्छा न होने के कारणउ वह प्रााण देकर भी नही करना चाहिए ।
तथा जो काम करना है इअपना कर्तव्य होने के कारणउ वह काम प्रााण देना पडे तो भी करना नही छोडना चाहिए ।


सुभाषित: परोपदेशे पांडित्यं सर्वेषां सुकरं नॄणाम् धर्मे
स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित् सुमहात्मन:

अर्थ: दूसरोंको उपदेश देकर अपना पांडित्य दिखाना बहौत सरल है। परन्तु केवल महान व्यक्तिही उसतरह से (धर्मानुसार)अपना बर्ताव रख सकता है।


सुभषित: अमित्रो न विमोक्तव्य: कॄपणं वणपि ब्राुवन्
कॄपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणाम्

अर्थ: शत्रु अगर क्षमायाचना करे, तो भी उसे क्षमा नही करनी चाहिये| वह अपने जीवन को हानि पहुचा सकता है यह सोचके उसको समाप्त करना चाहिये।


सुभषित: वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालविपर्यय:
अथैवमागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि

अर्थ: जब काल विपरीत हो, तब शत्रुको भी कन्धोंपे उठाना चाहिये। अनुकूल काल आनेपर उसे जैसे घट पथर पे फोड जाता है, वैसे नष्ट करना चाहिये।


सुभाषित: अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥

अर्थ: यह मेरा है, वह उसका है जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं। विस्तृत मस्तिष्क वाले लोगों के विचार से तो वसुधा एक कुटुम्ब है।


सुभाषित: सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्।।

अर्थ: यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे (अर्थात् श्लोककर्ता नारद के) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही सत्य है।


सुभाषित हिन्दी मे अर्थ सहित


सुभाषित: सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः।। अर्थ: सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।


सुभाषित: क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
अर्थ:क्षण-क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए। क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।

सुभाषित: अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥

अर्थ: तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।


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