पराधीनता के दाैर में हिंदू धर्म काे संजीवनी प्रदान करने वाले स्वामी विवेकानंद

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swami vivekananda jivani

पराधीनता के दाैर में हिंदू धर्म काे संजीवनी प्रदान करने वाले स्वामी विवेकानंद

भारत की आध्यात्मिक चेतना का प्रवाह इतना प्रबल रहा है कि सदियों से होने वाले आघातों और आक्रमणों के झंझावतों के बावजूद वह बरकरार रहा. सनातन धर्म की एक प्रकार से पुनर्स्थापना करनेवाले आदिगुरू भगवान शंकराचार्य के बाद अगर हिंदू धर्म को नए कलेवर और नई ऊर्जा से विश्वपटल पर रखने का कार्य यदि किसी ने किया तो वह नाम था स्वामी विवेकानंद का. आज जब हम पीछे मुडकर देखते हैं, और दुनिया की जीवन यात्रा में आए उतार चढाव पर समग्रता से दृष्टि डालते हैं तो सनातन हिंदू धर्म और अन्य सभ्यताओं के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है.

९/११ की नाम लेते ही सामान्य जनमानस पर दो गगनचुंबी इमारतों को भेदते हवाई जहाजों, विस्फोटों, भीषण चीत्कार, कोलाहल, कराह, वेदना, खून के धब्बे और रुदन करती मानवता का चेहरा झट से सामने आ जाता है. सारी दुनिया को अपने मजहब के अनुसार चलाने की जिद और क्रूरता का एक जीवंत प्रतीक था ९/११ के दिन अमेरिका में ट्विन टॉवर्स पर किया गया वह हमला. वहीं एक और ९/११ की घटना शायद ही लोगों के ध्यान में आती हो. यह प्रसंग मानवता और मानवीय संवेदना को एकाकी और अलग अलग विभागों में देखनेवाली पाश्चात्य विचारधारा को विश्वबंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम के द्वार पर ला खडा करती है. ये भारतीय संस्कृति का विराट दर्शन ही था जिसे स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी वाणी के माध्यम से ११ सितंबर १८९३ के दिन सारे विश्व समुदाय ने देखा. लेडीज एंड जेंटलमेन की संकल्पना से हटकर सारे समाज को `भाइयो और बहनों’ के रूप में भी देखा जा सकता है, शायद यह आभास पश्चिम को उसी दिन हुआ तभी तो कई मिनटों तक तालियों की गडगडाहट से विश्वधर्म सम्मेलन की सभा गूंजती रही. अब ये हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम भी ९/११ की इस घटना को वर्तमान और आनेवाली नई पीढियों के सामने प्रखरता से प्रस्तुत करें. ताकि सृजन और विनाश, सत्य और असत्य, मानवता और पशुता, देवत्व और दानवता के दो खेमों में बंटी दुनिया का अंतर स्पष्ट हो सके. `वे’ लोग सभी को अपने ही जैसा बना लेना चाहते हैं, अपने ही पहनावे, मजहब, रिलीजन में ढंक लेना चाहते हैं तो दूसरी ओर `मैं ही नहीं, तू भी’ का संदेश देकर सभी मार्गों को स्वीकृति देनेवाली संस्कृति नित्य निरंतर सहिष्णुता, उदारता और प्रेम की राह पर चलती रही है.

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स्वामी विवेकानंद इस सनातन संस्कृति और विचारधारा को अपने भीतर समेट कर चलनेवाले विभूति थे. एक तरह से वेदों का सार विवेकानंद के जीवन में देखा जा सकता है. अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण के संपर्क में आने पर जिस तरह से उन्होंने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में मां का साक्षात्‌ दर्शन एक बार नहीं कई बार किया, उसी प्रकार उन्होंने साकार और निराकार के भेद को स्पष्ट करते हुए बताया कि दोनों लगते अलग अलग हैं पर इनका गंतव्य तो एक ही है. ऐसे कई प्रसंग स्वामीजी के जीवन में आए हैं. अमरीका के उस विश्व प्रसिद्ध भाषण के बाद कई महीनों तक स्वामीजी का प्रवास अमेरिका और यूरोपीय देशों में होता रहा. चर्चों में भी उनके भाषण हुए. दुनिया उनकी मुरीद हो गई.

स्वामीजी के पश्चिमी जगत में व्यक्त हुए विचारों और प्रवचनों तथा भारत में आने के बाद दिए गए भाषणों और किए गए कार्यों में एक मूलभूत अंतर था. पश्चिम की यात्रा के दौरान अपने देश की महान सनातन संस्कृति का गौरव गान उन्होंने किये. धन-वैभव और अपार विलासिता में डूबे पश्चिमी जगत को भारतीय अध्यात्म और चेतना को समझने के लिए पश्चिम को प्रेरित किया. भौतिकता के शिखर को छू चुकी, सांसारिकता के दुष्प्रभावों को झेल रही जनता को स्वामीजी ने निवृत्ति का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया.

वही दूसरी ओर, भारत लौटने के बाद भारत की दरिद्र जनता के सामने उन्होंने प्रवृत्ति की बात कही. भारतीय समाज में फैली फैली कुरीतियों, कर्मकांड में उलझे लोगों और दलित, शोषित, पीडित जनता को पराधीनता की बेडियों को झटक कर खडे होने का आवाहन, स्वामीजी के प्रवचनों में देखने को मिलता है. दुनिया घूमकर देख चुके स्वामीजी को लगा कि सारी दुनिया में नई मानवता कितनी सबल और उत्साह से भरी है वहीं दूसरी तरफ भारत में निर्धनता और नग्नता का वास है. भारतीय संस्कृति में प्रवृत्ति और निवृत्ति में सदैव संतुलन रहा है और यही अपने धर्म की विशेषता रही है. यहां पर राजा-महाराजाओं, धन ऐश्वर्य के झूलों में मस्ती से झूलनेवाले धन्नासेठों और मां लक्ष्मी की कृपा से साधन संपन्न लोगों का बडा ही आदर समाज में रहा है तो वहीं सारे संसार, परिवार और अपना कही जानेवाली सारी वस्तुओं को त्याग कर भगवा धारण करने वाले साधुओं, संतों और मुनियों का शायद उनसे भी अधिक आदर समाज ने किया है. लेकिन ये रुझान कभी भी एकांगी नहीं रहा. इसमें दोनों का संतुलना रहा है और रहना भी चाहिए.

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शिकागो के विश्वधर्म सम्मेलन में स्वामीजी ने बिना किसी लाग लपेट के निर्भीकता से ईसाई जनता के समक्ष गर्जना करते हुए कहा था,“तुम ईसाई लोग मूर्तिपूजकों की आत्मा के बचाव के लिए भारत में धर्म प्रचारक भेजने को बहुत आतुर दिखते हो, किन्तु मूर्तिपूजकों के शरीर को भूख की आग से बचाने के लिए तुम क्या कर रहे हो? भयानक अकाल-सूखे के समय लाखों भारतवासी भूख से मर रहे थे, लेकिन तुम ईसाइयों से कुछ न हो सका. भारत की भूमि पर तुम कितने चर्च बनवाते जा रहे हो, लेकिन तुम्हें यह पता नहीं है कि पूर्वी जगत की आवश्यकता रोटी है, धर्म नहीं. धर्म एशियावालों के पास अब भी बहुत है. वे दूसरों से धर्म का पाठ नहीं पढना चाहते. जो जाति भूख से तडप रही है, उसके आगे धर्म परोसना, उसका अपमान है. जो जाति रोटी को तरस रही है, उसके हाथ में दर्शन और धर्म-ग्रंथ रखना उसका मजाक उड़ाना है.” एक बार एक नौजवान लडका स्वामीजी के पास गया और उनसे बोला, “स्वामीजी! मुझे गीता समझा दीजिए.“ स्वामीजी ने सच्चे मन से कहाल“गीता समझने का वास्तविक स्थान फुटबॉल का मैदान है. जाओ घंटे भर खेल-कूद लो. गीता तुम स्वयं समझ जाओगे.”

स्वामीजी ने हिंदुत्व की शुद्धि के लिए भरसक प्रयास किए. पंडे, पुरोहितों और स्वार्थ में अंधे हो चुके ब्राह्मणों को उन्होंने सांप की संज्ञा दी थी. समाज को धर्म के ज्ञान से वंचित रखने की जिम्मेदार उन्होंने ब्राह्मणों को माना. वह ब्राह्मण जो युगों से ज्ञान की थाती लिए चलता रहा और समाज को शिक्षित करता रहा, उसी समाज ने आज सारा कुछ अपने ही पास रख लिया है और संस्कृति के भंडार पर ताला लगा रखा है. इतने स्पष्ट और निर्भीक विचार केवल स्वामी विवेकानंद ही रख सकते हैं. भूख से पीडित भारतीय समाज को दरिद्र नारायण की संज्ञा देनेवाले स्वामीजी ने उसके पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए समाज को जगाने और इस दिशा में प्रवृत्त करने का महान कार्य किया. अपने संन्यासी बंधुओं के साथ ही समाज के जागरूक वर्ग को साथ लेकर स्वामी विवेकानंद जी ने `नर सेवा नारायण सेवा’ के महायज्ञ में खुद को झोंक दिया था. आज भी स्थिति अलग नहीं है. संकटों ने विविध रूप धारण कर लिए हैं, और चुनौतियों ने कई पहलुओं से विकराल रूप धारण कर रखा है, लेकिन आज भी इन सभी समस्याओं का उत्तर स्वामी विवेकानंद जी के जीवन में निहित है. बस आवश्यकता है कि हर व्यक्ति अपने भीतर छिपे विवेकानंद को बाहर लाए और समाज व धर्म की सेवा में लग जाए. स्वामी विवेकानंद जी के जीवन को हम जितना पढें – समझें उतना कम ही है. और शायद इसीलिए स्वामीजी को योद्धा संन्यासी कहा गया है!

लेखकः – श्री सत्यम मिश्रा 

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