कविकुल गुरु कालिदास

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कविकुल गुरु कालिदास

[click_to_tweet tweet=”कविकुल गुरु कालिदास संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, उनकी कवित्व शक्ति तथा प्रतिभा के कारण ही कविकुल गुरु उपाधि से उन्हें विभूषित किया गया हैं। उन्होनें भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार मानकर सरल और अलंकार युक्त भाषा में अपनी रचनाएं की ” quote=”कविकुल गुरु कालिदास संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, उनकी कवित्व शक्ति तथा प्रतिभा के कारण ही कविकुल गुरु उपाधि से उन्हें विभूषित किया गया हैं। वास्तव में कालिदास संस्कृत साहित्य की मणिमाला के मध्यमणि ही हैं। उन्होनें भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार मानकर सुंदर, सरल और अलंकार युक्त भाषा में अपनी रचनाएं की और अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत को एक नई दिशा देने की कोशिश की।”]

कालिदास जी साहित्य अभी तक हुए महान कवियों में अद्धितीय थे। उनके साहित्यिक ज्ञान का कोई वर्णन नहीं किया जा सकता। कालिदास का उपमाएं बेमिसाल हैं और उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं। मानो कि संगीत कालिदास जी के साहित्य के मुख्य अंग है इसके साथ ही उन्होनें अपने साहित्य में रस का इस तरह सृजन किया है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

श्रुंगार रस को उन्होनें अपनी कृतियों में इस तरह डाला है मानो कि पाठकों में भाव अपने आप जागृत हो जाएं। इसके साथ ही विलक्षण प्रतिभा से निखर महान कवि कालिदास जी के साहित्य की खास बात ये है कि उन्होनें साहित्यिक सौन्दर्य के साथ-साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है।

माना जाता है कि कालीदास मां काली के परम उपासक थे। अर्थात कालिदास जी के नाम का अर्थ है ‘काली की सेवा करने वाला’। कालिदास अपनी कृतियों के माध्यम से हर किसी को अपनी तरफ आर्कषित कर लेते थे। एक बार जिसको उनकी रचनाओं की आदत लग जाती बस वो उनकी लिखी गई्ं कृतियों में ही लीन हो जाता था।

कविकुल गुरु कालिदास का जीवन:

कविकुल गुरु कालिदास

कालिदास किस काल में हुए और वे मूलतः किस स्थान के थे इसमें काफ़ी विवाद है। चूँकि, कालिदास ने द्वितीय शुंग शासक अग्निमित्र को नायक बनाकर मालविकाग्निमित्रम् नाटक लिखा और अग्निमित्र ने १७० ईसापू्र्व में शासन किया था, अतः कालिदास के समय की एक सीमा निर्धारित हो जाती है कि वे इससे पहले नहीं हुए हो सकते।

छठीं सदी ईसवी में बाणभट्ट ने अपनी रचना हर्षचरितम् में कालिदास का उल्लेख किया है तथा इसी काल के पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में कालिदास का जिक्र है अतः वे इनके बाद के नहीं हो सकते। इस प्रकार कालिदास के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईसवी के मध्य होना तय है। दुर्भाग्यवश इस समय सीमा के अन्दर वे कब हुए इस पर विद्वानों में काफ़ी मतभेद हैं।

कई विद्वानों के अनुसार कालिदास उज्जयिनी के उन राजा विक्रमादित्य के समकालीन हैं जिन्होंने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् चलाया। विक्रमोर्वशीय के नायक पुरुरवा के नाम का विक्रम में परिवर्तन से इस तर्क को बल मिलता है कि कालिदास उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के राजदरबारी कवि थे। इन्हें विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक माना जाता है।

महान कवि और दार्शनिक कालिदास की शादी संयोग से राजकुमारी विद्योत्मा से हुई। ऐसा कहा जाता है कि राजकुमारी विद्योत्मा ने प्रतिज्ञा की थी की जो भी उन्हे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वे उसी के साथ शादी करेंगी जब विद्योत्मा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्दानों को हरा दिया तो अपमान से दुखी और इसका बदला लेने के लिए छल से कुछ विद्धानों ने कालिदास से राजकुमारी विद्योत्मा का शास्त्रार्थ करवाया और उनका विवाह राजकुमारी विद्योत्मा से करवा दिया।

आपको बता दें कि शास्त्रार्थ का परीक्षण के लिए राजकुमारी विद्योत्मा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे।

विद्योत्मा को लगता था कि कालिदास गूढ़ प्रश्न का गूढ़ जवाब दे रहे हैं। उदाहरण के लिए विद्योत्मा ने प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया तो कालिदास को लगा कि वह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही हैं।

इसलिए उसके जवाब में उन्होनें घूंसा दिखा दिया तब विद्योत्मा को लगा कि कालिदास कह रहे हैं कि पांचों इन्द्रियां भले ही अलग हों, सभी एक ही मन के द्धारा संचालित है।

इससे प्रभावित होकर राजकुमारी विद्योत्मा ने कालिदास से शादी करने के लिए हामी भर दी और उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

पत्नी विद्योत्मा की धित्कार के बाद कालिदास बने महान कवि:

कुछ दिनों बाद जब राजकुमारी विद्योत्मा को जब कालिदास की मंद बुद्धि का पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुईं और कालिदास जी को धित्कारा और यह कह कर घर से निकाल दिया कि सच्चे पंडित बने बिना घर वापस नहीं आना।

फिर क्या था पत्नी से अपमानित हुए कालिदास ने विद्या प्राप्त करने का संकल्प लिया और सच्चे पंडित बनने की ठानी और इस संकल्प के साथ वे घर से निकल प़ड़े। और मां काली की सच्चे मन से उपासना करने लगे।

जिसके बाद मां काली के आशीर्वाद से वे परम ज्ञानी और साहित्य के विद्धान बन गए। इसके बाद वे अपने घर लौटे, और अपनी पत्नी को आवाज दी, जिसके बाद विद्योत्मा दरवाजे पर सुनकर ही समझ गईं कि कोई विद्धान व्यक्ति आया है।

इस तरह उन्हें अपनी पत्नी के धित्कारने के बाद परम ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे महान कवि बन गए। आज उनकी गणना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कवियों में की जाने लगी यही नहीं संस्कृति साहित्य में अभी तक कालिदास जैसा कोई दूसरा कवि पैदा ही नहीं हुआ।

कालिदास की प्रमुख रचनाएँ:

महाकवि कालिदास के निम्नलिखित सात काव्य ग्रंथ है, जिनकी प्रमाणिकता को सभी विद्वानों ने स्वीकृति प्रदान की हैं। ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव, रघुवंश, मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्यवशियम् तथा अभिज्ञानशाकुन्तल. इनमें प्रथम दो गीति काव्य हैं, तृतीय तथा चतुर्थ महाकाव्य हैं तथा अंतिम तीन नाटक हैं. इन कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार हैं।

ऋतुसंहार

यह कालिदास की सर्वप्रथम कृति हैं। यह गीतिकाव्य है जिसमें षडऋतुओं का छः सर्गों में वर्णन हैं. ऋतुओं का वर्णन प्रायः उद्दीपन रूप में हुआ हैं।

मेघदूत

ऋतु संहार की अपेक्षा यह एक प्रौढ़ रचना हैं। यह एक गीतिप्रधान खंड काव्य हैं। इसमें कुबेर के शाप से रामगिरी में निर्वासित एक यक्ष वर्षा ऋतु आने पर मेघ के द्वारा अपनी अलका प्रवासिनी प्रिया को संदेश भेजता हैं। इसके दो खंड हैं पूर्व मेघ तथा उत्तर मेघ।

भाव पक्ष व कला पक्ष दोनों द्रष्टियों से यह एक उच्च श्रेणी का काव्य हैं। इसमें वियोग श्रृंगार रस है, फिर भी नैतिकता की शिष्टता काव्य में सर्वत्र है। पूर्व मेघ में प्रकृति के मनोरम दृश्यों का आकर्षक चित्रण है तथा उत्तर मेघ सौन्दर्य और प्रेम के चित्रण से भरा हुआ हैं। भावाभिव्यंजना तथा प्राकृतिक सौन्दर्य की द्रष्टि से यह अत्यंत ही सुंदर काव्य हैं।

कुमारसंभव

यह एक महाकाव्य हैं। इस महाकाव्य में पार्वती विवाह, कुमार जन्म, तारकासुर वध की कथा प्रमुख हैं, शेष प्रासंगिक कथायें हैं. इस महाकाव्य में 17 सर्ग हैं। परन्तु कुछ विद्वान् इनमें से प्रथम आठ को ही प्रमाणिक मानते हैं, शेष सर्गों को विद्वानों द्वारा बाद में जोड़ा हुआ माना गया हैं।

उदात्त, सरस एवं कोमल भावाभिव्यक्ति, स्वाभाविक एवं मंजुल कल्पनाएँ, कोमलकांत पदावली, अलंकारों का सहज स्वाभाविक प्रयोग, प्रकृति का सुरग्य चित्रण, तप, समाधि, संयोग, वियोग आदि का वर्णन इस काव्य की प्रमुख विशेषताएं हैं। कुमारसंभव कालिदास की उत्कृष्ट कोटि की रचना हैं।

रघुवंश

रघुवंश महाकाव्य कालिदास सर्वोत्कृष्ट रचना हैं। इस महाकाव्य के 19 सर्गों में सूर्यवंशी 30 राजाओं का वर्णन हैं। रघुवंश महाकाव्य में किसी एक नायक के चरित्र को आधार मानकर एक वंश से उत्पन्न अनेक नायकों को चरित्र चित्रित किये गये हैं।

रघुवंश के 19 सर्गों में सूर्यवंशी राजाओं दिलीप से लेकर राम तथा राम के वंशजों का चरित्र चित्रण किया गया हैं। इस महाकाव्य के प्रथम 9 सर्गों में राम के चार पूर्वजों दिलीप, रघु, अज और दशरथ का वर्णन मिलता हैं तथा दसवें सर्ग से 15 वें सर्ग तक के 6 सर्गों में राम के जीवन वृत्त का वर्णन हैं।

16 वें सर्ग से 18 वें सर्ग तक के चार सर्गों में राम के वंशजों का वर्णन मिलता हैं. 19 वें सर्ग में कामुक अग्निवर्ण का वर्णन मिलता हैं। सभी रसों का सुंदर वर्णन इस काव्य में हुआ हैं. रघु और राम के युद्ध वर्णनों में जहाँ वीर रस का चित्रण हुआ हैं, वहां आर्त विलाप में करुण रस की अजस्र धारा प्रवाहित होती हैं।

एक से एक सुंदर आदर्श रघु वंश में कवि ने प्रस्तुत किये हैं। रघुवंश में रघु के पुत्र अज का इंदुमती से विवाह, इन्दुमति की मृत्यु और अज का करुण विलाप, पुष्पक विमान द्वारा राम और सीता का प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन आदि का आकर्षक चित्रण हुआ हैं।

मालविकाग्निमित्र

कविकुल गुरु कालिदास द्वारा रचित यह नाटक हैं। इसमें पांच अंक है जिनमें शुंगवंश के संस्थापक पुष्यमित्र के पुत्र अग्रिमित्र और मालविका के प्रणय का सुंदर वर्णन किया गया हैं. कवि का यह प्रथम नाटक हैं, अतः काव्य कौशल का प्रौढतम रूप इसमें उपलब्ध नहीं होता, फिर भी नाट्य कला की द्रष्टि से यह एक अत्यंत सुंदर रचना हैं।

विक्रमोर्यवशियम्

कालिदास की नाट्यकला सम्बन्धी विकास की द्रष्टि से इस नाटक का द्वितीय स्थान हैं. पांच अंकों के इस नाटक में पुरुरवा उर्वशी की प्रसिद्ध पौराणिक कथा वर्णित हैं. इसमें कवि ने पुरुरवा तथा उर्वशी के उद्गम प्रेम का चित्रण बड़ी मार्मिकता से किया हैं।

अभिज्ञानशाकुन्तल

अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है। यह नाटक कुछ उन भारतीय साहित्यिक कृतियों में से है जिनका सबसे पहले यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ था। यह पूरे विश्व साहित्य में अग्रगण्य रचना मानी जाती है।

यह संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ नाटक हैं। भारतीय परम्परा इस नाटक को संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ नाटक मानती हैं काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला इसकी कथा महाभारत से ली गई हैं, इसमें सात अंक हैं।

इसमें हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत तथा शकुंतला के प्रेम, वियोग तथा पुनर्मिलन की कथा का वर्णन हैं. इसमें श्रृंगार और करुण रस का सुंदर निष्पादन हुआ हैं। कालिदास का यह नाटक नाट्यकौशल का सर्वश्रेष्ठ उदहारण हैं। नाटक का चतुर्थ अंक सर्वश्रेष्ठ हैं, कवि की सबसे महान विशेषता यह है कि इस नाटक का प्रत्येक पात्र चरित्र की द्रष्टि से सुद्रढ़ एवं आदर का पात्र हैं इसमें कविता की कोमलता, भावों की गहराई और उदात्ता आदि का सुंदर समावेश हैं।

कविकुल गुरु कालिदास संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी हैं, महाकाव्य, नाटक तथा गीतिकाव्य सभी क्षेत्रों में उनकी रचनाएँ अनुपम हैं। तत्कालीन समाज के सच्चे रूप तथा सांस्कृतिक चेतना की झांकी हमें उनकी रचनाओं में मिलती हैं. कालिदास की गणना विश्व के महान साहित्यकारों में की जाती हैं।

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